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ब्राह्मण स्वर्णकार समाज इतिहास

ब्राह्मण स्वर्णकार समाज का इतिहास  साभार श्री ब्राह्मण स्वर्णकार दर्पण जोधपुर (राज. )
 

श्री ब्राह्राण स्वर्णकारों का इतिहास व नामकरण

;प्रथम अध्याय  :  गौतम ऋशि - दर्षन )

                               आज से करीब 2100 सौ वर्श पूर्व हमारे पूर्वज ब्राह्राण श्रीमाल नगर (वर्तमान में भीनमाल ) में रहते थे । पूजा -पाठ , कर्म - कांड ,विद्याध्ययन , पठन - पाठन आदि से अपना जीवन व्यतीत करते थे । शने:शने: समाज में उनका आदर कम होने लगा तथा जीविकोपार्जन में भी असुविधा होने लगी । तब वे पूर्वज ऋशियों से शका समाधान के लिए अबू दाचल पर्वत (आबू माउण्ट ) पर उनके दर्षन के लिए गए । वहां कुछ ऋशि सैंकडों वर्शो से कठोर तप कर रहे थे ।  उन ऋशियों ने अपने वंषजों की बातें ध्यान से सुनीं । सुन कर उनका समाधान खोजने के लिए वे महान तपस्वी प्रज्ञाचक्ष श्री गौतम ऋशि के आश्रम के गये ।

यह दिव्य आश्रम बडा ही रमणीय  था । चारों तरफ आम, जम्बू , खजूर , नारंगी , गूलर , आंवले आदि के फलदार बडे - बडे पेड थे तथा मन्द - मन्द सुगन्ध लिए सोनचम्पा , केवडा , चमेली , गुलाब , मौलश्री , मोगरा आदि की लतायें सुसजिजत थीं । वहाँ पर पक्षियों का कर्णप्रिय , मधुर संगीत सुनार्इ देता था । पास ही दिव्य जरनों का सुपाच्य निर्मल जल बह रहा था ।   मृग , सिंह , खरगोष , मयूर , बन्दर , षुक आदि पषु पक्षी निर्भय होकर विचरण कर रहे थे , तथा कामधेनु के समान गायें भी आश्रम की षोभा बढा रही थीं ।   सम्पूर्ण दृश्य भक्ति  श्रृंगार  , संगीत ,वैराग्य तथा अध्यात्म का अनुपम संगम था ।

यह आश्रम आज भी आबू माउण्ट में भृगु आश्रम  (गऊ मुख ) से थोड़ी दूरी पर सिथत है और गौतम  ऋशि का आश्रम  नाम से प्रसिद्व है । (अब भी प्रति वर्श सैंकडों यात्री दर्षन को जाते है ) वहा उनको करीब 15 दिन तक उनके दर्षनाें का इन्तजार करना पडा, क्योंकि गौतम ऋशि अपनी गुफा से चन्द्रोदय के दिन माह में एक ही  दिन बाहर आते थे । वे जब समाधि से जाग्रत अवस्था में आये तो बाहर ब्राह्राणों सहित सभी ऋशियों ने उनको साश्टांग प्ररणाम किया ।   श्री गौतम ऋशि ने सबको आषीर्वाद दिया तथा आने का कारण पूछा ।   ऋशियों ने उनको अपने वंषजों की दषा से अवगत कराया । उनकी व्यथा सुनकर गोैतम ऋशि कुछ समय के लिए समाधिस्थ हो गये ।   एक पहर के बाद (करीब चार घण्टे ) उन्होंने अपने नेत्र खोले । उनके नेत्र नम थे । उन्होंने आदर पूर्वक कहा '' अब तुम्हारेे ऊपर सैंकडों वर्शो तक विपत्ति का साया रहेगा क्योंकि श्री लक्ष्मी जी के श्राप का समय आ गया है । भावी को कोर्इ नही टाल सकता ।    अत: अब तुमको अपनी स्वयं की पहिचान बनानी होगी तथा इस दु:ख से उबरने के लिए तुुमको अपने ब्रह्रात्व को समजते हुए अपनी जीविका बदलनी होगी ।    मान को त्यागना होगा । अपमान सहना पड़ेगा । घोर कश्ट से गुजरना होगा । सभी कुटुम्ब छित्र - भित्र हो जायेंगें  आदि आदि ।    उनके ऐसे वचन सुन कर ब्राह्राण उदास  हो गये , फिर भी विवेकपूर्वक  श्रद्वा से प्रार्थना करते हुए उन्होने प्रष्न किया कि यह लक्ष्मी जी का श्राप क्या है उन्होंने कब दिया  तथा कब तक रहेगा उसके निवारण का क्या उपाय है यह सब आप कृपा करके हमें बतायें । तब प्रेमपूर्वक परम आदरणीय  श्री गौतम ऋशि ने मीठे षब्दों में आदेष दिया कि आज चन्द्रोदय की रात है ।   इस मनोहर जगह पर माँ भगवती का ध्यान करते हुए आनन्दपूर्वक षयन करों ।  मै 4 दिन तक आपकी जिज्ञासा को षान्त करने के लिए आपके साथ ही रहूंगा तथा आपको सब बातें विस्तार से बताऊंगा । आप शांतचित होकर यहाँ रहो ।

।। प्रथम अध्याय सम्पूर्ण ।।

(द्वितीय अध्याय : श्री गौतम ऋशि द्वारा लक्ष्मीजी के श्राप का वर्णन )

प्रात: काल अरूणोदय के समय से एक घडी पहले सभी ऋशियाें ब्राह्राणों ने निद्रा त्याग कर देवऋशियों को प्ररणाम किया ।   षौच , स्नान से निवृत होकर , श्री गौतम ऋशि व अन्य ऋशियों के सात्रिध्य से सभी ब्राह्राणों ने यज्ञ , ऋचा , पठन , ध्यान , भजन - पूजन संगीत आदि के द्वारा अपने को धन्य किया ।    उसके बाद सभी ने अल्पाहार किया । अल्पाहार कि बाद सभी विषाल आम के वृक्ष के नीचे चर्मासन पर विराजे हुए गौतम ऋशि के समक्ष खजूर के व कुष के आश्रन पर  बैठ गये । उचित समय को समझते हुए भारद्वाज ऋशि ने गौतम ऋशि को आदरपूर्वक मीठे षब्दों में निवेदन किया कि ब्राह्राणों की जिज्ञासा षान्त करने के लिए श्री लक्ष्मी जी के षाप का वर्णन कीजिये ।

श्री गौतम ऋशि कहने लगे कि हजारों वर्श पहले स्वर्ग में श्री विश्णु भगवान के साथ रत्न जडित सिंहासन पर लक्ष्मीजी विराजमान थी । आज लक्ष्मीजी का जन्म - दिन था ।  सभी कलाकार माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए अपनी - अपनी कला का उपहार दे रहे थे । उसमें स्वर्ण कलाकाराें मेें प्रमुख श्री स्वर्ण सुगंधजी का बनाया हुआ लक्ष्मीजी के लिए एक जडाऊ हार उपहार में दिया गया । उसमें एक सौ आठ स्वर्ण कमल के फूल थे ।   हीरे ,पन्नेे ,माणक , मोती आदि रत्नों से कुन्दन की जउार्इ द्वारा तैयार किये गये थे । वहा जितनें भी कलाकारों ने अपने - अपने उपहार दिये थे , उसमें सबसें सुन्दर स्वर्णकारों का उपहार था । उस हार ने माँ लक्ष्मी का मन मोह लिया ।  उन्होने उन कलाकारों की बहुत प्रषंसा की तथा आर्षीवाद दिया कि समय आने पर आपकी कला देष में ही नहीं विदेषों में भी प्रसिद्व होगी तथा उस समय की सर्वश्रेश्ठ स्वर्णकला का श्रेय आपको प्राप्त होगा ।

फिर पूछा कि आपके गुरू कौन है हम उनसे मिलना चाहते है । उन्होंने उन ऋशियों के नाम बतायें जिनसें उन्होने यह कला सीखी थी । लक्ष्मीजी ने श्री विश्णु भगवान से प्रार्थना की कि आज मेरा जन्म दिन है और मुझे कोर्इ उपहार दे रहे है तो उन ऋशियों को बुलाइये जिनसे इन कलाकारोंं ने कला कि षिक्षा पार्इ है ।

विश्णु भगवान ने लक्ष्मीजी को समझाया कि ऋशियों को रंग भवन में बुलाना उनका अपमान होगा तथा इससे अनिश्ट की आषंका है । मगर लक्ष्मीजी त्रिया - हठ पर उतारू हो गर्इ  थी । अत: उनकी इच्छा के अनुसार श्री विश्णु भगवान ने ऋशियों को रंग भवन में उनके रंग महल में पधारे । श्री विश्णु भगवान की स्तुति करके बुलाने का कारण पूछा ।

श्री  विश्णु भगवान ने लक्ष्मीजी की तरफ इषारा किया कि उनसे पूछो । लक्ष्मीजी ने मीठे षब्दों में ऋशियों को बैठने का निवेदन किया ।  तथा उनसे कहा कि आपके षिश्य यह स्वर्णकमल का हार बना कर लाये है । यह मुझे बहुत ही पसन्द आया है । मगर मैं आपके कर - कमलों द्वारा इससें सुन्दर हार बनवाना चाहती हूँ । आप कृपा करके इससें भी सुन्दर एक हार बनाइये ।

यह बात सुन कर ऋशियोंं में प्रमुख भारद्वाज ऋशि ने निवेदन किया कि संसार में जितनी भी विधाय  हैं चाहे वह धनुविधा हो , अष्व परीक्षा , रत्न परीक्षा , आयुंर्वेद पाककला , गायन , नृत्य , काश्टकला , स्वर्णकला आदि सभी कलाओं के हम ज्ञाता जरूर है मगर हमारा काम योग्य षिश्योंं को कला सिखाने का है , स्वयं बनाने का नहीं । इस समय स्वर्ण सुगन्धजी हमारे षिश्याें में सर्वोतम कलाकार है । उसके द्वारा बनाया हुआ हार सर्वोतम है । अत: आप हमें क्षमा करें । यह सुन कर लक्ष्मीजी क्रोधित हो गर्इ । उपसिथत  ऋशियों को षाप दिया कि आपने हमारा अपमान किया है , मैं आपको षाप देती हूँ कि आपका पुण्य समाप्त होने पर आपको वंषजों को इसी स्वर्णकला से जीविकोपार्जन करना  पडे़गा ।  कुटुम्ब छित्र - भित्र हो जायेंगें । महान कश्ठ भोगना पडेगा । आप ऋशि तत्व , ब्राह्राण तत् व को भूल जायेंगें ।    श्री लक्ष्मीजी के मुख से ऐसे षब्द सुन कर तपोनिश्ठ  ऋशियों को भी क्रोध आ गया , मगर श्री विश्णु भगवान ने अनिश्ट की (ऋशियों द्वारा लक्ष्मी को षाप देने पर ) आषंका को समझते हुए लक्ष्मीजी से कहा कि आप मर्यादा भुल रही है । ये हमारे अतिथिगण तपोनिश्ठ ब्राह्राण ऋशि हैं । अगर इनके मुख से एक षब्द ही अनिश्ट का निकल गया तो उसको मिटाने वाला तीन लोक में कोर्इ नही है । गलती आपकी है अत: आपको इनसे क्षमा मांगनी चाहिए ।

अब  लक्ष्मीजी को भी दु:ख हुआ कि अपने श्रृंगार के लालच मैने ऋशियों का अपमान करके अनिश्ट किया । अत: उन्होने हदय से क्षमा मांगी तथा कहा कि '' मेरा षाप तो टल नहीं सकता , मगर आपके नाम व काम सभी स्वर्णकाराें में श्रेश्ठ रहेंगे । मै हमेषा आपके आगे रहूंगी क्योंकि अभी तो सिर्फ ब्राह्राण का एक ही बोध है । लेकिन समय आने पर ब्राह्राण भी कर्इ वर्गो में विभाजित हो जायेंगें । उस समय आपको श्री ब्राह्राण स्वर्णकारों के नाम से जाना जायेगा । कर्म से ब्राह्राण वृति नहीं करते हुए भी आर्यावतं में जितने भी ब्राह्राण होंगें उनके , पीछे ब्राह्राण लगेगा , मगर आपके पहले  ब्राह्राण का बोध होगा । आप हमेषा सातिवक गुणों से 
युक्त रहेंगें । स्वर्ण के रत्न जडित आभूशणें को बनाने मेें आपकी कोर्इ बराबरी नही कर सकेगा । जब तक आप सत्य स्वरूप मेरे पति की उपासना करतें रहेंगें  तब आपके पास मेरा निवास स्थायी रहेगा । - श्री लक्ष्मीजी से ऐसे वचन सुनकर ऋशियों ने लक्ष्मीजी से पूछा कि हमको ऋशि तत्व अर्थात ब्राह्राण तत्व की प्रापित कब होगी तथा पुन : हमारा संगठन व समृद्वि कब होगी तब लक्ष्मीजी ने उनको उपाय भी बतायें । लक्ष्मीजी ने ऋशियों को जो षाप दिया था जिसका वर्णन आपकी जिज्ञासा के कारण मैने आपको सुनाया है । अब आप सध्या करके भोजन ग्रहण करें तथा विश्राम आदि करकेें प्राकृतिक छटा का आनन्द लेते हुए षायन करें ।  ऐसा कहते हुए श्री गौतम ऋशि अपनी कुटिया में पधार गये  ।


।। द्वितीय अध्याय सम्पूर्ण ।।

(तृतीय अध्याय : गौतम ऋशि द्वारा विस्तार से समझाना )

प्रात : काले वेद मंत्रों की ध्वनि गुंजायमान हो रही थी । ऋशिगरण तथा सभी ब्राह्राण वेद मंत्रों से यज्ञादि कर्म कर रहे थे । सुगनिधत , वनौशधियों , घृत ,खीर , मेवा , तिल जौ समिधात्रौं आदि से आहुतियां दे रहे थे , आकाष मंडल सतोगुणी सुगनिधत वायु मण्डल द्वारा प्रकूति स्वयं माँ भगवती के सातिवक रूप् से आर्षीर्वाद दे रही थी । सबका मान आननिदत हो रहा था । इस प्रकार से मांगलिक कार्यो को पूर्ण करके सबने अल्पाहार किया । फिर श्री गौतम ऋशि के सम्मुख जाकर वे साश्ठांग प्रणाम करके बैठ गये । अब प्रसनमुद्रा में गौतम ऋशि आर्षीवाद देकर कहने लगे कि मैने आपको लक्ष्मी के षाप का वर्णन सुनाया है । आज आपको मैं विस्तार से आगे का वतान्त सुनाऊँगा । आप ध्यान से सुनिये । श्री गौतम ऋशि कहते है कि लक्ष्मी जी का षाप हमको हजारों वर्शो तक तो नही लगा , किन्तुु अब समय आ गया है , इसलिए हमें यह षाप भोगने के लिए तैयार रहना है क्योंकि आप सभी अब आलस्य व प्रमाद वष वेद ,पठन , पाठन , यज्ञादि कर्म आदि छोड़ चुके है । केवल भिक्षावृति जैसा जीवन षुरू हो गया है , इसलिए ब्राह्राणों का आदर कम हो गया है । यह षाप क्याेंकि भी आपके लिए अप वरदान हो सकेगा । अगर आप इन बातों को नही भुलेंगें । आप ब्राह्राणवृति छोड़ रहे है , मगर 4 से 15 साल के बच्चों का आप सामूहिक यज्ञोपवीत संस्कार अवष्य करते रहना तथा विवाह सामूहिक करना क्योंकि अब आपके रोजी रोटी के लिए अलग अलग जगह जाना पड़ेगा । साल में एक सामूहिक उत्सव अवष्य मनाना जिससे आपका संगठन मजबूत रहेगा । स्वर्ण का कार्य करने की जगह जो कचरा होवे , उसको वर्शभर इकठा करना । उसमें से जो स्वर्ण वापस प्राप्त होवे , उसको आधा धार्मिक तथा आधा सामाजिक कार्य में खर्च करना । उसको अपने घर या कोश में भूलकर भी नहीं रखना । जो स्वयं कही सेवावृति या व्यापार करे तो अपनी कमार्इ का 20 वा भाग इन कार्यो में लगाना चाहिए । ऐसा करने पर लक्ष्मी की कभी कमी नही रहेगी । नारी माँ लक्ष्मी का अंष है । उनका हमेषा आदर करना तथा जितनी ज्यादा सच्चार्इ आप में होगी , उतने आप सुखी रहेंगे। किसी प्रकार से स्वर्ण की चोरी मत करना , तौल भी सही रखना , चाहे ग्राहक कैसा भी हो । यदि वह आपको कम मजदूरी देवे तो ग्राहक को छोड़ देना मगर स्वर्ण की चोरी मत करता । आपके यहां लक्ष्मी का सदा स्थायी निवास रहेगा ।  घर परिवार में सुख षानित रहेगी । यदि आप अनथर् से द्रव्य प्राप्त करेंगे तो उससे वैभव तो हो जाएगा मगर घर में अषानित रहेगी । बड़ों के सामने छोटों की अकाल मृत्यु होगी । भार्इ भार्इ एक  एक दूसरे के षत्रु हो जायेंगें तथा द्रव्य कभी भी स्थायी नहीं रहेगा । अत: सच्चार्इ से सत्य परिश्रम की कमार्इ करना ही सर्वश्रेश्ठ रहेगा । यह सच्चार्इ सिर्फ स्वर्णकारी  कार्य करने वालों के लिए ही नही अपितु व्यापार ब्याज सेवावृति आदि सबके लिए अनिवार्य है ।  इससे आप सदा सुखी भाग्यषाली व सन्तोशी रहेंगें । इसके अतिरिक्त अनावष्यक संग्रह मत करना । अपनी आवष्यकता से ज्यादा द्रव्य होने पर उससे विषेश रूप् से अपने बन्धुओं की भरपूर सहायता करना आपकी लक्ष्मी दिन दूनी रात चौगुनी बढेगी ।  साथ ही सतोगुण की अभिवृद्वि होगी ।

किसी भी प्रकार का नषा मत करना । वारूणी (षराब ) का सेवन भूलकर भी मत करना । अगर भूलवष या औशधिवष भी सेवन हो जाये तो एक दिन का निरााहार उपवास जरूर करना । जिससे प्रायषिचत हो जाएगा ।

नित्य यज्ञ हो सके तो उत्तम हेै यदि नही होवे तो आप अपनी जगह पर ही धूप दीप पुश्प से माँ भगवती का पूजन ध्यान करके अपना स्वर्ण कला का कार्य षुरू करना । जहां तक हो सके रात्रि को भोजन नही करना ।

जितने भी दुर्गुण  है उनमें जुआ सबसे बुरा है । इससे पूरा परिवार बरबाद हो जाता है इसकी लत पडने पर मरने के बाद ही छुटती है । अत: भूलकर भी जुआ मत खेलना ।

पुत्रों के साथ पुत्रियों को भी स्वर्णकला जरूर सिखाना । पुत्र पुत्री में भेद मत रखना तथा कला को अपने बन्धुओ से कभी मत छिपाना । जितना तुम अपने बन्धुओं को स्वर्णकला सिखाओगे उतना ही तुम्हारी कला में निखार आयेगा तथा चेहरे पर एक अदभुत तेज का प्रभा मण्डल नजर आएगा ।

बह्रामुहर्त मेें उठना ब्राह्राण का प्रथम कर्तव्य है । सुर्योदय से पहले ही यज्ञ पूजन आदि कार्य सम्मत्र करके स्वर्णकला कार्य आरम्भ कार्य कर देना चाहिए । इस प्रकार की कार्य प्रर

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