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मृत्यु भोज नहीं करना चाहिए

 हिन्दू समाज में जब किसी परिवार में मौत हो जाती है, तो सभी परिजन बारह दिन तक शोक मानते हैं .तत्पश्चात तेरहवीं का संस्कार होता है, जिसे एक जश्न का रूप दे दिया जाता है. .इस दिन के संस्कार के अंतर्गत पहले कम से कम तेरह ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है जीसे जीमना भी कहते हैं.उसके बाद पंडितों द्वारा बताई गयी वस्तुएं मृतक की आत्मा की शांति के लिए ब्राह्मणों को दान में दी जाती हैं.उसके पश्चात् सभी आगंतुक रिश्तेदारों ,मित्रों एवं मोहल्ले के सभी अड़ोसी- पड़ोसियों को मृत्यु भोज के रूप में दावत दी जाती है.इस दावत में अन्य सभी दावतों के समान पकवान एवं मिष्ठान इत्यादि पेश किया जाता है. सभी आगंतुकों से दावत खाने के लिए आग्रह किया जाता है.जैसे कोई ख़ुशी का उत्सव हो.विडंबना यह है ये सभी संस्कार कार्यक्रम घर के मुखिया के लिए कराना आवश्यक होता है,वर्ना मृतक की आत्मा को शांती नहीं मिलती ,चाहे परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उसकी शांती वर्षों के लिए भंग हो जाय (उसे कर्ज लेकर संस्कार आयोजित करना पड़े ).दूसरी तरफ यदि परिवार संपन्न है,परन्तु घर के लोग इस आडम्बर में विश्वास नहीं रखते तो उन्हें मृतक के प्रति संवेदनशील और कंजूस जैसे शब्द कह कर अपमानित किया जाता है .
क्या यह तर्क संगत है ,परिवार के सदस्य की मौत का धर्म के नाम पर जश्न मनाया जाय ?क्या यह उचित है आर्थिक रूप से सक्षम न होते हुए भी अपने परिजनों का भविष्य दांव पर लगा कर पंडितों के घर भरे जाएँ ,और पूरे मोहल्ले को दावत दी जाय ?क्या परिवार को दरिद्रता के अँधेरे में धकेल कर मृतक की आत्मा को शांती मिल सकेगी ?क्या पंडितों को विभिन्न रूप में दान देकर ही मृतक के प्रति श्रद्धांजलि होगी ,उसके प्रति संवेदन शीलता मानी जाएगी ?

सभी भाई इस पर विचार करें की क्या म्रत्यु भोज करना सही हैं एक परिवार के  सदस्य म्रत्यु हो ,और हम उसकी म्रत्यु पर भोज का आयोजन करें सही नही लगता ,इसमें अगर कोई धर्म करने की महशुस करते हो तो ,गौ शाला में दान दे उनको चारा दे ,अनाथ बच्चों की मदद करदे ,जिनको भोजन नही मिलता हो उनको भोजन करादे ,जानवरों को जुवार डाले ,और भी कई साधन हैं जिनको करने से आत्मा की शांति होती हैं ,आओ एक आवाज के साथ आगे आये और इसको बंद करने में सहयोग करें ,

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